2017 में जब देश के ओजस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी ने यह संकल्प लिया था कि VIP कल्चर को जड़ से समाप्त करना है। तब से लेकर आज तक न जाने कितने ही आयोजनों की रौनक जन भागीदारी से बनी होगी। इसका हिसाब आज हमें सरकार से मांगना चाहिए।
क्योंकि सरकार से यह हिसाब मांगने का कोई फायदा नहीं कि VIP कल्चर के कारण मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ में कितने लोगों ने अपने अनमोल जीवन की आहुति संगम के पवित्र तट पर दी।
सवाल यह भी है कि भगदड़ केवल संगम के किनारे हुई थी या कुंभ मेले के अन्य स्थानों पर भी।
लल्लनटॉप के पत्रकार रिपोर्टर अभिनव पांडे जब सेक्टर 21 के झूसी इलाके में पहुंचे, तो वहां के दृश्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहे थे।
न जाने कितने लाखों चप्पलें अपने जोड़ों से बिछड़ चुकी थीं।
प्रशासन को केवल संगम की स्थिति को संभालने में इतना संघर्ष करना पड़ा कि झूसी की घटना पर उनका ध्यान ही नहीं गया।
सोशल मीडिया के साधनों का धन्यवाद, जिनकी मदद से उस युवा पत्रकार को वहां की खबर मिली।
धन्यवाद उन सफाई कर्मचारियों का भी, जिन्होंने मलबा साफ करने में जल्दबाजी नहीं की, जिससे कैमरे में वो भयंकर दृश्य, पूरा न सही, कुछ हद तक तो दिख सका।
जिसने भी ये दृश्य देखे, उसका मन निराश हो गया। सामने आ रहा सच डरावना था - एक सफाई कर्मचारी ने बताया कि आठ ट्रॉली भर के मलबा जा चुका है।
लेकिन यह मलबा जाते हुए किसी प्रशासनिक अधिकारी ने न देखा, न ही यह जानने की कोशिश की कि क्या हुआ है।
जब उसी पत्रकार ने प्रशासनिक अधिकारी से पूछा कि क्या आपको दूसरे हादसे की खबर थी, तो जवाब था "नहीं"।
शायद एक नहीं, दो नहीं, और भी कहीं ऐसी स्थितियां बनी होंगी और कई लोग काल-कवलित हुए होंगे, मगर इसकी जानकारी न हमें है, न ही शायद अधिकारियों को।
जैसे कि प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि हमारे लिए हर इंसान महत्वपूर्ण है, तो मेला आयोजित करने वाले अधिकारियों को यह बात समझनी चाहिए थी। उन्हें मृतकों की गिनती बड़ी सावधानी से करनी चाहिए थी, ताकि हर एक व्यक्ति जो अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर चुका है, वह भी उस सूची में शामिल हो सके। लेकिन मेले के एक शिविर में बैठे दो अधिकारियों ने 12 घंटे बाद बड़ी सरलता से इसकी घोषणा कर दी।
क्या यह आंकड़ा भी किसी बड़े ज्योतिषी ने दिया है, जिन्होंने 144 साल के बाद कुंभ का यह आंकड़ा हमारे सामने रखा है?
हमें उन अधिकारियों से यह भी पूछना चाहिए कि जिन्होंने कुंभ के पहले ही करोड़ों यात्रियों के आंकड़े दे दिए थे, वे किस आधार पर बताए गए और क्या वे आंकड़े वास्तव में सटीक हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, कुंभ में 29 तारीख को छह हादसे हुए और तीस से अधिक लोग प्रयाग में गंगा की गोद में समा गए।
क्या आज भी मोदी जी को वह EPI का संकल्प याद होगा? क्या वे इसका संज्ञान लेंगे?
क्या उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन इस घटना का संज्ञान लेगा, या फिर इस बात पर ज्यादा ध्यान देगा कि कितने विज्ञापन कितनी बार कितने चैनलों पर दिखाए गए।
